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केदार (गौरी) व्रत का महत्व — दीपावली (दिवाली)

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केदार गौरी व्रत, जिसे सामान्यतः दीपावली कहा जाता है, भारतभर में अत्यन्त श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। जाति, मत, धन–अधन के भेद से रहित होकर लोग इस पर्व का पालन करते हैं। वास्तव में, बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि यह एक प्रमुख शैव व्रत है।

ब्रृङ्गि ऋषि भगवान् शिव के महान् भक्त थे। वे केवल भगवान् शिव की ही उपासना करते थे और देवी शक्ति की उपेक्षा करते थे। इस कारण देवी शक्ति ने क्रुद्ध होकर उनके शरीर से जीवनशक्ति को निकाल लिया। फलतः वे खड़े भी न रह सके। उन्होंने भगवान् शिव से प्रार्थना की। भगवान् ने उन्हें सहारा देने हेतु एक दण्ड प्रदान किया।

देवी शक्ति ने भगवान् शिव के अर्धांग रूप में एकत्व प्राप्त करने की इच्छा से केदार-व्रत का पालन किया, जो भगवान् का परम प्रिय व्रत है। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने अपने शरीर का बाँया भाग उन्हें प्रदान किया और अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए।
अतः यह व्रत केदार गौरी व्रत कहलाया, क्योंकि गौरी ने ही इसका अनुष्ठान किया।


व्रत का समय

यह केदार-व्रत  श्रावण मास के शुक्ल पक्ष अष्टमी से प्रारम्भ होकर इक्कीस दिनों तक विधिपूर्वक किया जाता है।
अन्तिम दिवस (दीपावली  - अमावस्या) को विशेष श्रद्धा एवं शुद्धता से इसका समापन किया जाता है।


व्रत की विधि

भगवान् केदारेश्वरस्वामी का प्रतिष्ठापन जलभरे कलश में किया जाता है।
उस कलश पर मण्डप की रचना की जाती है।
इक्कीस गाठोंवाले इक्कीस सूत्रों का निर्माण कर व्रतसूत्र तैयार किया जाता है।
सोलहोपचार पूजन इक्कीस दिनों तक प्रतिदिन किया जाता है —
श्रावण शुक्ल पक्ष अष्टमी से आरम्भ कर आश्विन अमावस्या (दीपावली) तक।
अन्तिम दिन, शुद्ध और सज्जित स्थान में, अन्न के ऊपर केले के पत्ते बिछाकर कलश का पुनः प्रतिष्ठापन किया जाता है तथा नाना प्रकार के नैवेद्य एवं फल भगवान् को अर्पित कर श्रद्धापूर्वक दान किया जाता है।

केदारेश्वर पूजा विधानम्
 


केदार-व्रत का माहात्म्य

(श्री स्कन्द पुराण — उपदेशकाण्ड से)

तत्पश्चात् पूज्य श्री सूत महामुनि ने शौनक आदि ऋषियों से कहा —

“हे मुनिवरगण! अब मैं तुम्हें उस केदार-व्रत की पवित्र महिमा का वर्णन करता हूँ, जो समस्त कल्याणों का मूल कारण है।”


व्रत का अनुष्ठान

यह पवित्र व्रत आश्विन  मास के शुक्ल पक्ष अष्टमी से आरम्भ किया जाता है।
इसे एकविंशतिदिन (इक्कीस दिन) तक श्रद्धा, नियम और पवित्रता से सम्पन्न करना चाहिए।
अन्तिम दिन शुद्धाचार सहित विधानपूर्वक पूजा करके नियत विधि के अनुसार आहार ग्रहण करना चाहिए।


व्रत के फल

जो कोई इस व्रत का पालन करता है, उसे सर्वाभीष्ट सिद्धि, सांसारिक सुख, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, और अन्ततः मोक्ष की सिद्धि होती है।


इतिहास से उदाहरण

प्राचीन काल में श्री गौरी देवी ने यही व्रत किया था, और इस तपस्या के फलस्वरूप भगवान् शिव के अर्धांग में स्थान प्राप्त कर वे अर्धनारीश्वर की अर्धांगी बनीं।
इसी प्रकार भगवान् विष्णु ने इस व्रत के प्रभाव से वैकुण्ठ के अधिपति पद को प्राप्त किया, तथा भगवान् ब्रह्मा को हंस वाहन की प्राप्ति हुई।
अष्टदिक्पालक भी इस व्रत के अनुष्ठान से ब्रह्मा के श्राप से मुक्त हुए।


भक्तों पर अनुग्रह

भााग्यवती और पुण्यवती नाम की दो सत्पत्नियाँ इस व्रत का पालन कर अनन्त समृद्धि और दिव्य आनन्द से सम्पन्न हुईं।
एक पुण्यात्मा ब्राह्मण, जो भगवान् उमापति का भक्त था, इस व्रत के अनुष्ठान से सौ पुत्रों का पिता बना।
उसने अपने पुत्रों को भी यह व्रत करने का आदेश दिया। दीर्घायु और सांसारिक सुखभोग के उपरान्त वह शिवलोक को प्राप्त होकर मुक्त हुआ।


समापन

इस प्रकार असंख्य भक्तों ने इस केदार-व्रत, जो भगवान् गौरीनाथ को परम प्रिय है, का पालन कर परम मोक्ष प्राप्त किया।
जो कोई इस केदार-व्रत माहात्म्य को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, वह भी सांसारिक सुख भोगकर अन्त में परम मुक्तिपद को प्राप्त होता है।

 

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